'' सूर्य सिद्धांत ''

'' जब भी प्रकृति में प्रदूषण बढ़ने लगता है तब प्रकृति उसी मृदा में जैविक संरचना कर देती है जिसमें जीव प्रदूषण को अपना आहार बनाकर मिटा देता है और अपनी मृदा को सिद्धांत कर आवागमन से मुक्त होकर एक गुणधारी स्तम्भ बन जाता है। ''

'अशोक मानव '

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हमारे बारे में

प्रकृति मेल वह आईना है जिसमें आप अपनी वास्तविक तस्वीर के साथ प्रकृति की हर क्रिया प्रतिक्रिया का वैज्ञानिक स्वरुप देखें।

'अशोक मानव '

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हमारा लक्ष्य

प्रवृत्ति वह रसायन गंध है जो अपने संपर्क में आए पदार्थ विषय की रासायनिक क्रिया से अपनी आवश्यकता के अनुरूप गुणों का लाभ या हानि का एहसास कराकर विचार पैदा कराती है जो तत्व ज्ञान है। इसी ज्ञान से व्यक्ति उसे धारण करता है या छोड़ देता है पर यहां पर व्यक्ति विषय को पूरी प्रकृति या समाज से जोड़ कर इसी क्रिया से तत्व ज्ञान को जान सकता है और जो मार्ग समाज में सत स्थापित करनेवाला मिले उसी पर चलना और दूसरों को चला देना

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दृष्टिकोण

मानव समय की आवाज को पहचानने की क्षमता रखता है। परिस्थिति को अपने ज्ञान दृष्टि से बदल सकता है। जिस विषय की इच्छा करें उस गुण को दे सकता है। प्रवृत्ति का विकास तो प्रकृति का स्वभाव है पर मानव अपने ज्ञान दृष्टि सेविषय को दिशा दे सकता है मानव जो देखता है, जो सुनता है, गंध सेजो एहसास करता है, छूने सेजो अनुभूति होती है या खाने सेजिन गुणों का विकास होता है वह सब उसकी प्रवृत्ति की गंध से मिलावट करके शरीर में रासायनिक क्रिया करती है जो अपनी गंध से प्रभावित होकर एक नए गुण का विकास करती है।

पाठकनामा

प्रकृति मेल तेरा भी जवाब नहीं
प्र शब्द से तुम प्रकृति के हर कौने कौने तक
प्रकाश फैलाती हो
नया सवेरा लाकर नयी
ऊर्जा व शक्ति का संचार करती हो
कृ शब्द से सभी पर कृपा बरसाती हो
ति शब्द से तुम हर व्यक्ति के मन में
तितली बनकर उड़ान भरती हो
मे शब्द से मेरा तेरा भूलकर
जन जन में विश्वास जगाती हो
ल शब्द से लम्बा इंतजार करा कर
प्रकृति मेल जब तुम आती हो
तब हर किसी पाठक का
मन प्रफुल्लित हो जाता हैं
प्रकृति से नाता जोड़ कर
प्रकृति मेल तुमने कमाल कर दिया
वाह रे प्रकृति मेल , तेरा क्या कहना
तभी तो किसी महापुरुष ने कहा है कि
प्रेम चेहरा देखकर नहीं अपितु
स्वभाव देखकर कीजिए
धन्य है प्रकृति मेल
जो तुम हर माह आकर
हमें प्रकृति से रूबरू रू कराती हो
तेरे प्रयास को सलाम हैं


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सुनील कुमार माथुर जोधपुर, राजस्थान

प्रकृति मेल के दिसंबर अंक 23 में मानव मूल्यों पर आपका संपादकीय पढ़ा " सदाचरण " सार्गभित लगी । परिस्थितियों अनुसार मानव स्वभाव बदलता रहता है और उसी अनुरूप वह अपने आचरण में भी बदलाव करता है । लेकिन जो जीवन मूल्यों के साथ संघर्ष करते हुए आगे बढ़ता है वही उसका सदाचरण है । बहुत बढ़िया !

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श्यामल बिहारी महतो बोकारो, झारखंड

प्रकृति मेल का अंक नवंबर पढ़ कर लगा बहुत ही सुंदर 'सदुपयोग' संपादकीय चिंतन करता सद्विचार से सिंचन 'दो टूक' स्तंभ विचित्र सूक्तियां जिसमें दें मित्र प्रकृति में कोई भी अनुमान सचमुच होता है विज्ञान अन्य विषय में भी बहु ज्ञान समसामयिक है सिद्ध विधान रोचक कविता, कथा, कहानी हर रचना है बड़ी सुहानी गुरु जी की 'क्या बात है' गहरी बना रही पाठक को प्रहरी ' प्रकृति मेल' के क्या गुण गाऊँ पढ़कर जीवन धन्य बनाऊँ 

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गौरीशंकर वैश्य विनम्र लखनऊ, यू पी